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mahabharat 1.216.2: (और वह इस प्रकार बोली—) 'ब्रह्मन्! मैं रूप, यौवन और काम के मद में पागल हो गई थी। इसी कारण मुझसे यह अनुचित कार्य हुआ। आप मेरे अपराध को क्षमा करें॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 1.216: वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपूर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 216: वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपूर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.216.2 
रूपेण वयसा चैव कन्दर्पेण च दर्पिता:।
अयुक्तं कृतवत्य: स्म क्षन्तुमर्हसि नो द्विज॥ २॥
 
 
अनुवाद
(और वह इस प्रकार बोली—) 'ब्रह्मन्! मैं रूप, यौवन और काम के मद में पागल हो गई थी। इसी कारण मुझसे यह अनुचित कार्य हुआ। आप मेरे अपराध को क्षमा करें॥ 2॥
 
(And she spoke thus—) 'Brahman! I had become mad with beauty, youth and lust. That is why I committed this inappropriate act. Please forgive my crime.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)