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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 216: वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपूर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.216.14 
ता वयं चिन्तयित्वैव मुहूर्तादिव भारत।
दृष्टवत्यो महाभागं देवर्षिमुत नारदम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! हम पिछले दो घण्टों से इसी विषय पर विचार कर रहे थे कि हमें महामुनि नारद के दर्शन हुए।
 
O best of the Bharatas! We were contemplating on this issue for the past couple of hours when we had the darshan of the great sage Narada.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)