श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 215: अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ  »  श्लोक 13-15h
 
 
श्लोक  1.215.13-15h 
दीप्यमाना श्रिया राजन् दिव्यरूपा मनोरमा।
तदद्‍भुतं महद् दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनंजय:॥ १३॥
तां स्त्रियं परमप्रीत इदं वचनमब्रवीत्।
का वै त्वमसि कल्याणि कुतो वासि जलेचरी॥ १४॥
किमर्थं च महत् पापमिदं कृतवती पुरा।
 
 
अनुवाद
राजन! वह दिव्य सुन्दरी अपनी अद्भुत कांति से शोभायमान हो रही थी। इस महान आश्चर्य को देखकर कुन्तीपुत्र धनंजय अत्यन्त प्रसन्न हुए और उस स्त्री से इस प्रकार बोले - 'कल्याणी! तुम कौन हो और तुम्हें जलयोनि कैसे प्राप्त हुई? तुमने पूर्वकाल में ऐसा महान पाप क्यों किया था, जिसके कारण तुम्हें यह दुर्भाग्य भोगना पड़ा?'॥13-14 1/2॥
 
King! That divinely beautiful lady was radiating with her wonderful radiance. Seeing this great wonder, Kunti's son Dhananjay became very happy and spoke to that lady thus - 'Kalyani! Who are you and how did you get the aquatic form? Why did you commit such a great sin in the past due to which you had to suffer this misfortune?'॥ 13-14 1/2॥
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