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mahabharat 1.215.10: इतने में ही जल में विचरण करते हुए एक महापथिक ने पुरुषोत्तम कुन्तीकुमार धनंजय का एक पैर पकड़ लिया ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.215: अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 215: अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.215.10 
अथ तं पुरुषव्याघ्रमन्तर्जलचरो महान्।
जग्राह चरणे ग्राह: कुन्तीपुत्रं धनंजयम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
इतने में ही जल में विचरण करते हुए एक महापथिक ने पुरुषोत्तम कुन्तीकुमार धनंजय का एक पैर पकड़ लिया ॥10॥
 
Meanwhile, a great traveler wandering in the water caught hold of one leg of Dhananjay, the best of men, Kuntikumar. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)