अध्याय 215: अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ
श्लोक 1: वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् अर्जुन दक्षिण समुद्र के तट पर तपस्वियों से सुशोभित परम पुण्य तीर्थस्थानों में गए॥1॥
श्लोक 2: उन दिनों तपस्वी लोग पाँच तीर्थों को छोड़कर जाते थे। ये वही तीर्थ थे जो पूर्वकाल में तपस्वी मुनियों से भरे रहते थे॥ 2॥
श्लोक 3-4: उनके नाम इस प्रकार हैं - अगस्त्यतीर्थ, सौभद्रतीर्थ, परम पावन पौलोमतीर्थ, अश्वमेध यज्ञ का फल देने वाले निर्मल करंधमतीर्थ तथा पापों का नाश करने वाले महान भारद्वाजतीर्थ। कौरवों में श्रेष्ठ अर्जुन ने इन पाँच तीर्थों का दर्शन किया। 3-4॥
श्लोक 5: पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देखा कि ये सब तीर्थस्थान अत्यन्त निर्जन हैं, फिर भी एक ही धर्म में बुद्धि लगाए हुए ऋषिगण इन तीर्थस्थानों को दूर ही से छोड़ रहे हैं ॥5॥
श्लोक 6: तब कुरुनन्दन धनंजय ने दोनों हाथ जोड़कर तपस्वी ऋषियों से पूछा - ‘वेदभाष्यकार और ऋषिगण इन तीर्थस्थानों का परित्याग क्यों कर रहे हैं?’॥6॥
श्लोक 7: तपस्वी बोले - कुरुपुत्र! उन तीर्थों में पाँच मगरमच्छ हैं जो स्नान करते हुए तपस्वी मुनियों को जल में खींच लेते हैं; इसीलिए इन तीर्थों को मुनियों ने त्याग दिया है।
श्लोक 8: वैशम्पायनजी कहते हैं - उनके वचन सुनकर कौरवों में श्रेष्ठ और महान भुजाओं वाले अर्जुन उन भक्तों के मना करने पर भी उन तीर्थों का दर्शन करने चले गए॥8॥
श्लोक 9: तत्पश्चात् महारथी अर्जुन सहसा महर्षि सुभद्रा के पवित्र तीर्थ में उतरकर स्नान करने लगे॥9॥
श्लोक 10: इतने में ही जल में विचरण करते हुए एक महापथिक ने पुरुषोत्तम कुन्तीकुमार धनंजय का एक पैर पकड़ लिया ॥10॥
श्लोक 11: परन्तु बलवानों में श्रेष्ठ, कुंती का पराक्रमी पुत्र उछल पड़ा और उस जलचर को लेकर जल से बाहर निकल आया।
श्लोक 12: जब महाबली अर्जुन ने मगरमच्छ को जल के ऊपर खींच लिया, तब वह समस्त आभूषणों से विभूषित एक अत्यंत सुंदर स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गया॥12॥
श्लोक 13-15h: राजन! वह दिव्य सुन्दरी अपनी अद्भुत कांति से शोभायमान हो रही थी। इस महान आश्चर्य को देखकर कुन्तीपुत्र धनंजय अत्यन्त प्रसन्न हुए और उस स्त्री से इस प्रकार बोले - 'कल्याणी! तुम कौन हो और तुम्हें जलयोनि कैसे प्राप्त हुई? तुमने पूर्वकाल में ऐसा महान पाप क्यों किया था, जिसके कारण तुम्हें यह दुर्भाग्य भोगना पड़ा?'॥13-14 1/2॥
श्लोक 15: वरगा ने कहा- महाबाहु! मैं नंदनवन में विचरण करने वाली अप्सरा हूँ॥15॥
श्लोक 16: महाबल! मेरा नाम वरगा है। मैं हमेशा से कुबेर का प्रेमी रहा हूँ। मेरे चार और दोस्त भी हैं। सभी सुंदर हैं और अपनी मर्ज़ी से चल सकती हैं।
श्लोक 17: एक दिन मैं उन सबके साथ जगत के रक्षक कुबेर के घर जा रहा था। रास्ते में हमें एक ब्राह्मण दिखाई दिया जो उत्तम व्रत का पालन कर रहा था॥17॥
श्लोक 18: वह अत्यन्त सुन्दर था और एकान्त में वेदों का अध्ययन करता था। राजन! उसकी तपस्या से सम्पूर्ण वन क्षेत्र प्रकाशमान हो रहा था। 18॥
श्लोक 19-20h: वे सूर्य के समान सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित कर रहे थे। उनकी तपस्या तथा उनके अद्भुत एवं उत्कृष्ट रूप को देखकर हम सभी अप्सराएँ उनकी तपस्या में विघ्न डालने की इच्छा से उस स्थान पर अवतरित हुईं॥19 1/2॥
श्लोक 20-21: भरत! मैं, सौरभेयी, समीचि, बुदबुदा और लता - हम पाँचों मिलकर उस ब्राह्मण के पास गए और हँसने-गाने लगे, उसे लुभाने लगे।
श्लोक 22: परन्तु हे वीर! उसने अपने मन को किसी प्रकार भी हमारी ओर आकर्षित नहीं होने दिया। वह महाप्रतापी ब्राह्मण शुद्ध तपस्या में तत्पर था। उसे इससे तनिक भी चिन्ता नहीं हुई ॥22॥
श्लोक 23: हमारे अहंकार से क्रुद्ध होकर ब्राह्मण ने हमें शाप दे दिया - 'तुम सौ वर्षों तक जल में मगरमच्छ बनकर रहोगे।'॥ 23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥