अपुत्र: प्रसवेनार्थी तपस्तेपे स उत्तमम्।
उग्रेण तपसा तेन देवदेव: पिनाकधृक्॥ २०॥
ईश्वरस्तोषित: पार्थ देवदेव उमापति:।
स तस्मै भगवान् प्रादादेकैकं प्रसवं कुले॥ २१॥
अनुवाद
'उनके कोई पुत्र न था, अतः पुत्र प्राप्ति की इच्छा से वे घोर तप करने लगे। पार्थ! उन्होंने उस घोर तप से पिनाकधारी देवाधिदेव महेश्वर को संतुष्ट किया। तब देवदेवेश्वर भगवान उमापति ने उन्हें वरदान देते हुए कहा - 'तुम्हारे कुल में एक ही सन्तान होगी।' ॥20-21॥
'He had no son, so with the wish of having a son, he started performing penance. Parth! He satisfied Pinakadhari Devadhidev Maheshwar with that fierce penance. Then Devdeveshwar Lord Umapati gave him a boon and said - 'There will be one child in your family'. 20-21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥