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mahabharat 1.213.9-10: जब गंगाजी के तट पर नाना प्रकार की अग्नियाँ प्रज्वलित की गईं और मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले, धर्ममार्ग पर चलने वाले विद्वान ब्राह्मणों ने स्नान किया, पुष्पांजलि अर्पित की और पूर्वोक्त अग्नियों में आहुति दी, तब उन महात्माओं के द्वारा उस गंगाद्वार नामक तीर्थ की शोभा बहुत बढ़ गई॥9-10॥   |   mahabharat अध्याय 1.213: अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 213: अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  1.213.9-10 
तेषु प्रबोध्यमानेषु ज्वलितेषु हुतेषु च।
कृतपुष्पोपहारेषु तीरान्तरगतेषु च॥ ९॥
कृताभिषेकैर्विद्वद्भिर्नियतै: सत्पथि स्थितै:।
शुशुभेऽतीव तद् राजन् गङ्गाद्वारं महात्मभि:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जब गंगाजी के तट पर नाना प्रकार की अग्नियाँ प्रज्वलित की गईं और मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले, धर्ममार्ग पर चलने वाले विद्वान ब्राह्मणों ने स्नान किया, पुष्पांजलि अर्पित की और पूर्वोक्त अग्नियों में आहुति दी, तब उन महात्माओं के द्वारा उस गंगाद्वार नामक तीर्थ की शोभा बहुत बढ़ गई॥9-10॥
 
When the different fires were lit on the banks of the Ganga and the learned Brahmins, who were on the right path and had kept their mind and senses under control, had bathed, offered gifts of flowers and then made oblations in the aforesaid fires, then the beauty of that pilgrimage place called Gangadwar was greatly enhanced by those great souls.॥ 9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)