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mahabharat 1.213.31: हे पुरुषश्रेष्ठ! आज मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे कुन्तीपुत्र! आप प्रतिदिन कितने ही दीन-हीनों और अनाथों की रक्षा करते हैं ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 1.213: अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 213: अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.213.31 
शरणं च प्रपन्नास्मि त्वामद्य पुरुषोत्तम।
दीनाननाथान् कौन्तेय परिरक्षसि नित्यश:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! आज मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे कुन्तीपुत्र! आप प्रतिदिन कितने ही दीन-हीनों और अनाथों की रक्षा करते हैं ॥31॥
 
O best man! Today I have come to your refuge. O son of Kunti! You protect so many poor and orphans every day. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)