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mahabharat 1.213.22: जलचारिणी! मैं भी तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ। मैंने पहले कभी कोई असत्य बात नहीं कही है॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 1.213: अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 213: अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.213.22 
तव चापि प्रियं कर्तुमिच्छामि जलचारिणि।
अनृतं नोक्तपूर्वं च मया किंचन कर्हिचित्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जलचारिणी! मैं भी तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ। मैंने पहले कभी कोई असत्य बात नहीं कही है॥ 22॥
 
Jalacharini! I want to please you too. I have never said anything untrue before.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)