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mahabharat 1.213.15: उस समय कुन्तीपुत्र धनंजय ने उसी अग्नि में निर्भय होकर अग्निहोत्र किया, जिससे अग्निदेव अत्यन्त प्रसन्न हुए॥15॥   |   mahabharat अध्याय 1.213: अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 213: अर्जुनका गंगाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.213.15 
तत्राग्निकार्यं कृतवान् कुन्तीपुत्रो धनंजय:।
अशङ्कमानेन हुतस्तेनातुष्यद् हुताशन:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस समय कुन्तीपुत्र धनंजय ने उसी अग्नि में निर्भय होकर अग्निहोत्र किया, जिससे अग्निदेव अत्यन्त प्रसन्न हुए॥15॥
 
At that time, Kunti's son Dhananjaya fearlessly performed his Agnihotra ritual in the same fire. This pleased Agnidev very much.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)