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mahabharat 1.212.28-30: अर्जुन के मुख से ये अप्रिय वचन सुनकर धर्मराज ने दुःखी होकर लड़खड़ाती हुई वाणी में कहा, "तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?" इसके बाद राजा युधिष्ठिर ने धर्म से कभी विचलित न होने वाले अपने भाई गुडाकेश धनंजय से पुनः विनीत स्वर में कहा, "अनघ! यदि तुम मुझे प्रमाण मानते हो, तो मेरी बात सुनो-॥ 28-30॥   |   mahabharat अध्याय 1.212: अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 212: अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 28-30
 
 
श्लोक  1.212.28-30 
इत्युक्तो धर्मराजस्तु सहसा वाक्यमप्रियम्॥ २८॥
कथमित्यब्रवीद् वाचा शोकार्त: सज्जमानया।
युधिष्ठिरो गुडाकेशं भ्राता भ्रातरमच्युतम्॥ २९॥
उवाच दीनो राजा च धनंजयमिदं वच:।
प्रमाणमस्मि यदि ते मत्त: शृणु वचोऽनघ॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन के मुख से ये अप्रिय वचन सुनकर धर्मराज ने दुःखी होकर लड़खड़ाती हुई वाणी में कहा, "तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?" इसके बाद राजा युधिष्ठिर ने धर्म से कभी विचलित न होने वाले अपने भाई गुडाकेश धनंजय से पुनः विनीत स्वर में कहा, "अनघ! यदि तुम मुझे प्रमाण मानते हो, तो मेरी बात सुनो-॥ 28-30॥
 
Hearing these unpleasant words from Arjuna's mouth, Dharmaraja, grieved, said in a faltering voice, "Why are you doing this?" After this, King Yudhishthira again spoke to his brother Gudakesh Dhananjay, who never deviated from the religious principles, in a humble tone, "Anagh! If you consider me as the proof, then listen to what I say -॥ 28-30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)