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mahabharat 1.212.14: इधर उस व्यथित ब्राह्मण के वचन उसे बार-बार अपने अस्त्र-शस्त्र लाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जब वह और अधिक रोने-चीखने लगा, तब अर्जुन दुःखी होकर सोचने लगा-॥14॥   |   mahabharat अध्याय 1.212: अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 212: अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.212.14 
तस्य चार्तस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमान: पुन: पुन:।
आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दु:खित:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इधर उस व्यथित ब्राह्मण के वचन उसे बार-बार अपने अस्त्र-शस्त्र लाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जब वह और अधिक रोने-चीखने लगा, तब अर्जुन दुःखी होकर सोचने लगा-॥14॥
 
Here the words of that distressed Brahmin were repeatedly inspiring him to bring his weapons. When he started crying and screaming more, then Arjuna became sad and thought -॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)