श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 211: तिलोत्तमापर मोहित होकर सुन्द-उपसुन्दका आपसमें लड़ना और मारा जाना एवं तिलोत्तमाको ब्रह्माजीद्वारा वरप्राप्त तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.211.28 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता महात्मानो नारदेन महर्षिणा।
समयं चक्रिरे राजंस्तेऽन्योन्यवशमागता:।
समक्षं तस्य देवर्षेर्नारदस्यामितौजस:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! नारद मुनि की यह बात सुनकर एक-दूसरे के अधीन रहने वाले महाप्रतापी एवं महान पाण्डवों ने मुनि के सामने यह नियम बनाया।
 
Vaishmpayana says - 'Janamejaya! On hearing this from sage Narada, the illustrious and great Pandavas, who were subservient to each other, made this rule in front of the sage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)