श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 211: तिलोत्तमापर मोहित होकर सुन्द-उपसुन्दका आपसमें लड़ना और मारा जाना एवं तिलोत्तमाको ब्रह्माजीद्वारा वरप्राप्त तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.211.2 
देवगन्धर्वयक्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम्।
आदाय सर्वरत्नानि परां तुष्टमुपागतौ॥ २॥
 
 
अनुवाद
देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य और दैत्यों के समस्त रत्न छीनकर वे दोनों दैत्य बहुत प्रसन्न हुए ॥2॥
 
Having snatched away all the gems of the gods, Gandharvas, Yakshas, serpents, humans and demons, those two demons felt very happy. ॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)