vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 1: आदि पर्व
»
अध्याय 211: तिलोत्तमापर मोहित होकर सुन्द-उपसुन्दका आपसमें लड़ना और मारा जाना एवं तिलोत्तमाको ब्रह्माजीद्वारा वरप्राप्त तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण
»
श्लोक 2
श्लोक
1.211.2
देवगन्धर्वयक्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम्।
आदाय सर्वरत्नानि परां तुष्टमुपागतौ॥ २॥
अनुवाद
देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य और दैत्यों के समस्त रत्न छीनकर वे दोनों दैत्य बहुत प्रसन्न हुए ॥2॥
Having snatched away all the gems of the gods, Gandharvas, Yakshas, serpents, humans and demons, those two demons felt very happy. ॥2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×