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mahabharat 1.210.2: उन्होंने अपने मन, इन्द्रियों और क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली थी, फिर भी सम्पूर्ण जगत पर दया करके वे ब्रह्माजी के धाम को चले गए॥2॥   |   mahabharat अध्याय 1.210: तिलोत्तमाकी उत्पत्ति, उसके रूपका आकर्षण तथा सुन्दोपसुन्दको मोहित करनेके लिये उसका प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 210: तिलोत्तमाकी उत्पत्ति, उसके रूपका आकर्षण तथा सुन्दोपसुन्दको मोहित करनेके लिये उसका प्रस्थान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.210.2 
तेऽभिजग्मुर्जितक्रोधा जितात्मानो जितेन्द्रिया:।
पितामहस्य भवनं जगत: कृपया तदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने अपने मन, इन्द्रियों और क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली थी, फिर भी सम्पूर्ण जगत पर दया करके वे ब्रह्माजी के धाम को चले गए॥2॥
 
He had conquered his mind, senses and anger. Still, out of compassion for the entire universe, he went to the abode of Lord Brahma.॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)