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mahabharat 1.208.29-30: तत्पश्चात् उसने अपनी जटाएँ काटकर सिर पर मुकुट धारण कर लिया, बहुमूल्य आभूषण और स्वच्छ वस्त्र धारण कर लिए और ऐसा प्रकाश फैला दिया, मानो असमय ही चाँदनी फैल गई हो और दिन-रात एक समान हो गए हों। उसके सभी सम्बन्धी सदैव मौज-मस्ती में मग्न रहते थे।   |   mahabharat अध्याय 1.208: सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 208: सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  1.208.29-30 
ततस्तौ तु जटा भित्त्वा मौलिनौ सम्बभूवतु:।
महार्हाभरणोपेतौ विरजोऽम्बरधारिणौ॥ २९॥
अकालकौमुदीं चैव चक्रतु: सार्वकालिकीम्।
नित्यप्रमुदित: सर्वस्तयोश्चैव सुहृज्जन:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उसने अपनी जटाएँ काटकर सिर पर मुकुट धारण कर लिया, बहुमूल्य आभूषण और स्वच्छ वस्त्र धारण कर लिए और ऐसा प्रकाश फैला दिया, मानो असमय ही चाँदनी फैल गई हो और दिन-रात एक समान हो गए हों। उसके सभी सम्बन्धी सदैव मौज-मस्ती में मग्न रहते थे।
 
Thereafter, he cut off his matted locks and wore a crown on his head and wore precious ornaments and clean clothes and spread such a light, as if the moonlight had spread out untimely and the day and night had become constant. All his relatives were always immersed in fun and frolic. 29-30.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)