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mahabharat 1.208.24: सुन्द और उपसुन्द बोले, 'पितामह! फिर मुझे यह वरदान दीजिए कि हम तीनों लोकों में एक-दूसरे के अतिरिक्त किसी भी जीवित या निर्जीव वस्तु से मृत्यु का भय न रखें।   |   mahabharat अध्याय 1.208: सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 208: सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.208.24 
सुन्दोपसुन्दावूचतु:
त्रिषु लोकेषु यद् भूतं किंचित् स्थावरजङ्गमम्।
सर्वस्मान्नो भयं न स्यादृतेऽन्योन्यं पितामह॥ २४॥
 
 
अनुवाद
सुन्द और उपसुन्द बोले, 'पितामह! फिर मुझे यह वरदान दीजिए कि हम तीनों लोकों में एक-दूसरे के अतिरिक्त किसी भी जीवित या निर्जीव वस्तु से मृत्यु का भय न रखें।
 
Sunda and Upasunda said, 'Grandfather! Then grant me this boon that we should not fear death from any living or non-living thing in the three worlds except each other.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)