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mahabharat 1.208.10: उन दैत्यों की तपस्या के प्रभाव से बहुत समय तक पीड़ित रहने के कारण विन्ध्य पर्वत से धुआँ निकलने लगा। यह एक आश्चर्यजनक बात थी ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.208: सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 208: सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.208.10 
तयोस्तप:प्रभावेण दीर्घकालं प्रतापित:।
धूमं प्रमुमुचे विन्ध्यस्तदद्‍भुतमिवाभवत्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
उन दैत्यों की तपस्या के प्रभाव से बहुत समय तक पीड़ित रहने के कारण विन्ध्य पर्वत से धुआँ निकलने लगा। यह एक आश्चर्यजनक बात थी ॥10॥
 
Being tormented for a long time by the effects of the austerities of those demons, the Vindhya mountain began to emit smoke. This was an astonishing thing. ॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)