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mahabharat 1.207.d18-d27h: वे सभी मामलों में तथा वर्णों के सभी दोषों का निर्णय करने के लिए सभी लोगों के अधिकारी हैं। सभी लोग सदैव उनकी पूजा करते हैं। नारदजी नाना प्रकार के स्वरों, व्यंजनों, नाना प्रकार के छन्दों, समस्थानिक सभी वर्णों, समान्य और धातु (बलयुक्त स्वरों) का प्रयोजन बहुत अच्छी तरह समझाते हैं। वे सम्पूर्ण आख्यात प्रकरण (धातु, तिंगन्त आदि का स्वरूप) की व्याख्या कर सकते हैं। वे सभी प्रकार की संधियों का पूर्ण रहस्य जानते हैं। वे शब्दों और अंगों का निरन्तर स्मरण करते हैं, वे काल द्वारा निर्दिष्ट वास्तविक तत्त्व का चिन्तन करते हैं और वे लोगों के गुप्त अभिप्राय को भी जानते हैं - वे क्या करना चाहते हैं। उन्हें विभाषित (वैकल्पिक), भाषित (निश्चित रूप से कहा गया) और बोधगम्य काल का वास्तविक ज्ञान है। वे स्वयं और दूसरों के लिए स्वर संस्कार और योग साधना के लिए तत्पर रहते हैं। वे इन प्रत्यक्ष गतिमान स्वरों को जानते हैं, वे शब्दों के स्वरों को भी जानते हैं, वे कही गई बातों का सार जानते हैं और उनकी एकता और अनेकता को समझते हैं। उन्हें परम सत्य का सच्चा ज्ञान है। वह नाना प्रकार के उल्लंघनों (अपराधों) को भी जानता है। वह अभेद और भेद की दृष्टि से बार-बार तत्त्व का चिन्तन करता रहता है। वह शास्त्रीय वाक्यों के विविध क्रमों का भी पुनरावलोकन करता है और नाना प्रकार के अर्थों को समझने में कुशल है, उनसे उत्पन्न प्रत्ययों का उसे पूर्ण ज्ञान है। वह स्वरों, वर्णों और अर्थों से वाणी को अलंकृत करता है। वह प्रत्येक धातु के प्रत्ययों का क्रमबद्ध रूप से वर्णन करने वाला है। वह पाँच प्रकार के अक्षर समूहों और स्वरों को भी यथार्थ रूप से जानता है।   |   mahabharat अध्याय 1.207: पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 207: पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना  »  श्लोक d18-d27h
 
 
श्लोक  1.207.d18-d27h 
प्रमाणभूतो लोकस्य सर्वाधिकरणेषु च।
सर्ववर्णविकारेषु नित्यं सकलपूजित:॥
स्वरेऽस्वरे च विविधे वृत्तेषु विविधेषु च।
समस्थानेषु सर्वेषु समाम्नायेषु धातुषु॥
उद्देश्यानां समाख्याता सर्वमाख्यातमुद्दिशन्।
अभिसंधिषु तत्त्वज्ञ: पदान्यङ्गान्यनुस्मरन्॥
कालधर्मेण निर्दिष्टं यथार्थं च विचारयन्।
चिकीर्षितं च यो वेत्ता यथा लोकेन संवृतम्॥
विभाषितं च समयं भाषितं हृदयङ्गमम्।
आत्मने च परस्मै च स्वरसंस्कारयोगवान्॥
एषां स्वराणां वेत्ता च बोद्धा च वचनस्वरान्।
विज्ञाता चोक्तवाक्यानामेकतां बहुतां तथा॥
बोद्धा हि परमार्थांश्च विविधांश्च व्यतिक्रमान्।
अभेदतश्च बहुशो बहुशश्चापि भेदत:॥
वचनानां च विविधानादेशांश्च समीक्षिता।
नानार्थकुशलस्तत्र तद्धितेषु च सर्वश:॥
परिभूषयिता वाचां वर्णत: स्वरतोऽर्थत:।
प्रत्ययांश्च समाख्याता नियतं प्रतिधातुकम्॥
पञ्च चाक्षरजातानि स्वरसंज्ञानि यानि च।)
 
 
अनुवाद
वे सभी मामलों में तथा वर्णों के सभी दोषों का निर्णय करने के लिए सभी लोगों के अधिकारी हैं। सभी लोग सदैव उनकी पूजा करते हैं। नारदजी नाना प्रकार के स्वरों, व्यंजनों, नाना प्रकार के छन्दों, समस्थानिक सभी वर्णों, समान्य और धातु (बलयुक्त स्वरों) का प्रयोजन बहुत अच्छी तरह समझाते हैं। वे सम्पूर्ण आख्यात प्रकरण (धातु, तिंगन्त आदि का स्वरूप) की व्याख्या कर सकते हैं। वे सभी प्रकार की संधियों का पूर्ण रहस्य जानते हैं। वे शब्दों और अंगों का निरन्तर स्मरण करते हैं, वे काल द्वारा निर्दिष्ट वास्तविक तत्त्व का चिन्तन करते हैं और वे लोगों के गुप्त अभिप्राय को भी जानते हैं - वे क्या करना चाहते हैं। उन्हें विभाषित (वैकल्पिक), भाषित (निश्चित रूप से कहा गया) और बोधगम्य काल का वास्तविक ज्ञान है। वे स्वयं और दूसरों के लिए स्वर संस्कार और योग साधना के लिए तत्पर रहते हैं। वे इन प्रत्यक्ष गतिमान स्वरों को जानते हैं, वे शब्दों के स्वरों को भी जानते हैं, वे कही गई बातों का सार जानते हैं और उनकी एकता और अनेकता को समझते हैं। उन्हें परम सत्य का सच्चा ज्ञान है। वह नाना प्रकार के उल्लंघनों (अपराधों) को भी जानता है। वह अभेद और भेद की दृष्टि से बार-बार तत्त्व का चिन्तन करता रहता है। वह शास्त्रीय वाक्यों के विविध क्रमों का भी पुनरावलोकन करता है और नाना प्रकार के अर्थों को समझने में कुशल है, उनसे उत्पन्न प्रत्ययों का उसे पूर्ण ज्ञान है। वह स्वरों, वर्णों और अर्थों से वाणी को अलंकृत करता है। वह प्रत्येक धातु के प्रत्ययों का क्रमबद्ध रूप से वर्णन करने वाला है। वह पाँच प्रकार के अक्षर समूहों और स्वरों को भी यथार्थ रूप से जानता है।
 
He is the authority for all people for giving decisions in all the cases and all the defects of the Varnas. Everyone always worships him. Naradji explains the purpose of various types of vowels, consonants, different types of meters, all the Varnas with same place, Samannaya and Dhatu (stressed vowels) very well. He can explain the complete Aakhyaata Prakarana (form of Dhatu, Tingant etc.). He knows the complete secrets of all types of Sandhi. He constantly remembers the words and parts, he thinks about the real element specified by the time and he also knows the hidden intentions of the people – what they want to do. He has the real knowledge of Vibhashit (optional), Bhashit (definitely stated) and understood time. He remains ready for Swara Sanskar and Yoga Sadhana for himself and others. He knows these directly moving vowels, he also knows the vowels of words, he knows the essence of the things spoken and understands their unity and multiplicity. He has the true knowledge of the ultimate truth. He also knows various types of violations (crimes). He keeps on thinking about the essence again and again with the vision of non-difference and difference. He also reviews the various orders of the classical sentences and is skilled in understanding the meanings of various types, he has complete knowledge of the suffixes derived from them. He adorns speech with vowels, letters and meanings. He is the one who explains the suffixes of each metal in a systematic manner. He also knows the five types of letter groups and vowels in a true manner.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)