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mahabharat 1.207.d1-d2: वे उस आकाश से होकर आए, जिसका उपयोग तारे करते हैं, जिस पर गरुड़ विचरण करते हैं, जहाँ चंद्रमा और सूर्य का प्रकाश फैलता है और जिसकी सेवा महान ऋषि करते हैं। आकाश का वह दिव्य मार्ग उन लोगों के लिए कठिन है जो तपस्वी नहीं हैं।   |   mahabharat अध्याय 1.207: पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 207: पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना  »  श्लोक d1-d2
 
 
श्लोक  1.207.d1-d2 
(पथा नक्षत्रजुष्टेन सुपर्णचरितेन च॥
चन्द्रसूर्यप्रकाशेन सेवितेन महर्षिभि:।
नभ:स्थलेन दिव्येन दुर्लभेनातपस्विनाम्॥
 
 
अनुवाद
वे उस आकाश से होकर आए, जिसका उपयोग तारे करते हैं, जिस पर गरुड़ विचरण करते हैं, जहाँ चंद्रमा और सूर्य का प्रकाश फैलता है और जिसकी सेवा महान ऋषि करते हैं। आकाश का वह दिव्य मार्ग उन लोगों के लिए कठिन है जो तपस्वी नहीं हैं।
 
He came through the sky, which is used by the stars, on which Garuda walks, where the light of the moon and the sun spreads and which is served by great sages. That divine path of the sky is difficult for those who are not ascetics.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)