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mahabharat 1.207.21: युधिष्ठिर! अतः परस्पर प्रेम बढ़ाने वाले सौहार्द की रक्षा करो और ऐसे नियम बनाओ कि यहाँ तुम लोगों में किसी प्रकार का वैर या विरोध न हो।   |   mahabharat अध्याय 1.207: पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 207: पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.207.21 
रक्ष्यतां सौहृदं तस्मादन्योन्यप्रीतिभावकम्।
यथा वो नात्र भेद: स्यात् तत् कुरुष्व युधिष्ठिर॥ २१॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! अतः परस्पर प्रेम बढ़ाने वाले सौहार्द की रक्षा करो और ऐसे नियम बनाओ कि यहाँ तुम लोगों में किसी प्रकार का वैर या विरोध न हो।
 
Yudhishthira! Therefore, protect the cordiality that promotes mutual love and make such rules that there is no enmity or opposition amongst you people here. 21.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)