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mahabharat 1.206.d82-d84: युधिष्ठिर ने कहा— निष्पाप वृष्णिनन्दन! आपकी कृपा से ही मुझे राज्य प्राप्त हुआ है। वीर! आपकी कृपा से ही यह अत्यंत दुर्गम एवं निर्जन प्रदेश आज धन-धान्य से युक्त राष्ट्र बन गया है। महान्! आपकी कृपा से ही हम सिंहासन पर आसीन हुए हैं। माधव! जीवन के अंत में भी आप ही हम पाण्डवों के एकमात्र मोक्ष हैं। आप ही हमारे माता-पिता और इष्टदेव हैं। हम पाण्डु को नहीं जानते। निष्पाप! आप ही समझकर हमसे वह कार्य करवाएँ जो करने योग्य है। पाण्डवों के लिए जो भी अभीष्ट हो, कृपया हमें वह कार्य करने की अनुमति दीजिए।   |   mahabharat अध्याय 1.206: पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 206: पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान  »  श्लोक d82-d84
 
 
श्लोक  1.206.d82-d84 
युधिष्ठिर उवाच
तव प्रसादाद् वार्ष्णेय राज्यं प्राप्तं मयानघ।
प्रसादादेव ते वीर शून्यं राष्ट्रं सुदुर्गमम्॥
तवैव तु प्रसादेन राज्यस्थाश्च महामते।
गतिस्त्वमन्तकाले च पाण्डवानां तु माधव॥
मातास्माकं पिता देवो न पाण्डुं विद्म वै वयम्।
ज्ञात्वा तु कृत्यं कर्तव्यं कारयस्व भवान् हि न:।
यदिष्टमनुमन्तव्यं पाण्डवानां त्वयानघ॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा— निष्पाप वृष्णिनन्दन! आपकी कृपा से ही मुझे राज्य प्राप्त हुआ है। वीर! आपकी कृपा से ही यह अत्यंत दुर्गम एवं निर्जन प्रदेश आज धन-धान्य से युक्त राष्ट्र बन गया है। महान्! आपकी कृपा से ही हम सिंहासन पर आसीन हुए हैं। माधव! जीवन के अंत में भी आप ही हम पाण्डवों के एकमात्र मोक्ष हैं। आप ही हमारे माता-पिता और इष्टदेव हैं। हम पाण्डु को नहीं जानते। निष्पाप! आप ही समझकर हमसे वह कार्य करवाएँ जो करने योग्य है। पाण्डवों के लिए जो भी अभीष्ट हो, कृपया हमें वह कार्य करने की अनुमति दीजिए।
 
Yudhishthira said— Sinless Vrishninandan! I have attained the kingdom only by your grace. Brave! By your grace only this very remote and uninhabited region has become a nation full of wealth and grains today. Great! By your mercy only we have been seated on the throne. Madhav! Even at the end of the life you are the only salvation for us Pandavas. You are our parents and Ishtadev. We do not know Pandu. Sinless! You yourself should understand and make us do the work that is worth doing. Whatever is desired for the Pandavas, please allow us to do that work.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)