Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.206.d70-d80: वह नगर चारों वर्णों के लोगों से परिपूर्ण था। वहाँ प्रतिष्ठित शिल्पी रहते थे। वह नगर उपभोग की समस्त सामग्रियों से परिपूर्ण था। वहाँ सदैव महान पुरुष निवास करते थे। असंख्य स्त्री-पुरुष उस नगर की शोभा बढ़ाते थे। मतवाले हाथी, ऊँट, गाय, बैल, गधे और बकरे आदि पशु भी वहाँ सदैव उपस्थित रहते थे। विश्वकर्मा द्वारा निर्मित उस नगर में साधु-संत सदैव एकत्रित रहते थे। वह इन्द्रप्रस्थ नगर स्वर्ग के समान प्रतीत होता था। महाराज! महान कौरव राजा, कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने वेदों में पारंगत विद्वान ब्राह्मणों द्वारा शुभ अनुष्ठान सम्पन्न कराकर द्वैपायन व्यास को आगे किया और धौम्य मुनि के परामर्शानुसार अपने भाइयों और भगवान श्रीकृष्ण के साथ बत्तीस द्वारों वाले तोरणद्वार के सामने आकर वर्धमान नामक नगर द्वार में प्रवेश किया। उस समय शंख और नगाड़ों की ध्वनि बहुत ऊँची सुनाई दे रही थी। हजारों ब्राह्मणों के मुख से निकलते हुए विजय के नारे सुनाई दे रहे थे। मुनि, सूत, मागध और बंदीगण राजा की स्तुति कर रहे थे। राजा युधिष्ठिर हाथी पर बैठे हुए थे। वे राजमार्ग पार करके एक सुंदर भवन में पहुँचे जहाँ शुभ अनुष्ठान हो रहे थे। उस भवन में प्रवेश करके, नाना प्रकार के सम्मानों से विभूषित होकर, भगवान श्रीकृष्ण सहित राजा युधिष्ठिर ने शेष सभी ब्राह्मणों का एक-एक करके पूजन किया। तत्पश्चात, असंख्य नर-नारियों से सुशोभित वह देश और नगर, पशुओं से समृद्ध हो गया और कृषि दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। | mahabharat अध्याय 1.206: पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वह नगर चारों वर्णों के लोगों से परिपूर्ण था। वहाँ प्रतिष्ठित शिल्पी रहते थे। वह नगर उपभोग की समस्त सामग्रियों से परिपूर्ण था। वहाँ सदैव महान पुरुष निवास करते थे। असंख्य स्त्री-पुरुष उस नगर की शोभा बढ़ाते थे। मतवाले हाथी, ऊँट, गाय, बैल, गधे और बकरे आदि पशु भी वहाँ सदैव उपस्थित रहते थे। विश्वकर्मा द्वारा निर्मित उस नगर में साधु-संत सदैव एकत्रित रहते थे। वह इन्द्रप्रस्थ नगर स्वर्ग के समान प्रतीत होता था। महाराज! महान कौरव राजा, कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने वेदों में पारंगत विद्वान ब्राह्मणों द्वारा शुभ अनुष्ठान सम्पन्न कराकर द्वैपायन व्यास को आगे किया और धौम्य मुनि के परामर्शानुसार अपने भाइयों और भगवान श्रीकृष्ण के साथ बत्तीस द्वारों वाले तोरणद्वार के सामने आकर वर्धमान नामक नगर द्वार में प्रवेश किया। उस समय शंख और नगाड़ों की ध्वनि बहुत ऊँची सुनाई दे रही थी। हजारों ब्राह्मणों के मुख से निकलते हुए विजय के नारे सुनाई दे रहे थे। मुनि, सूत, मागध और बंदीगण राजा की स्तुति कर रहे थे। राजा युधिष्ठिर हाथी पर बैठे हुए थे। वे राजमार्ग पार करके एक सुंदर भवन में पहुँचे जहाँ शुभ अनुष्ठान हो रहे थे। उस भवन में प्रवेश करके, नाना प्रकार के सम्मानों से विभूषित होकर, भगवान श्रीकृष्ण सहित राजा युधिष्ठिर ने शेष सभी ब्राह्मणों का एक-एक करके पूजन किया। तत्पश्चात, असंख्य नर-नारियों से सुशोभित वह देश और नगर, पशुओं से समृद्ध हो गया और कृषि दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी।
That city was full of people of all four castes. Respected artisans lived there. That city was full of all the materials of consumption. Great men always lived there. Innumerable men and women enhanced the beauty of that city. Animals like drunken elephants, camels, cows, bulls, donkeys and goats were also always present there. Sadhus and sages always gathered in that city built by Vishwakarma. That Indraprastha city looked like heaven. King! The great Kaurava king, the son of Kunti, Yudhishthir, after getting the auspicious rituals done by the learned Brahmins well versed in the Vedas, put Dwaipayan Vyas in front and as per the advice of Dhoumya Muni, along with his brothers and Lord Krishna came in front of the archway with thirty-two doors and entered the city gate called Vardhaman. At that time the sound of conches and drums could be heard very loudly. The slogans of victory coming from the mouths of thousands of Brahmins could be heard. Munis, Sutas, Magadhs and prisoners were praising the king. King Yudhishthira was sitting on an elephant. He crossed the highway and entered a beautiful building where auspicious rituals had been performed. After entering that building, being honoured with various types of honours, King Yudhishthira, along with Lord Krishna, worshipped all the remaining Brahmins one by one. Thereafter, that country and city, adorned with innumerable men and women, became rich in cattle and agriculture started increasing day by day.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥