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mahabharat 1.206.d1: वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! इसी प्रकार महाबली विदुर कुन्ती के महल में गए। वहाँ उन्होंने भूमि पर सिर टेककर उनके चरणों में प्रणाम किया। विदुर को आते देख कुन्ती बार-बार विलाप करने लगीं।   |   mahabharat अध्याय 1.206: पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 206: पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  1.206.d1 
( वैशम्पायन उवाच
पृथायास्तु तथा वेश्म प्रविवेश महाद्युति:।
पादौ स्पृष्ट्वा पृथायास्तु शिरसा च महीं गत:।
दृष्ट्वा तु देवरं कुन्ती शुशोच च मुहुर्मुहु:॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! इसी प्रकार महाबली विदुर कुन्ती के महल में गए। वहाँ उन्होंने भूमि पर सिर टेककर उनके चरणों में प्रणाम किया। विदुर को आते देख कुन्ती बार-बार विलाप करने लगीं।
 
Vaishampayana says- Janamejaya! Similarly, the mighty Vidur went to Kunti's palace. There he bowed his head on the ground and paid his respects to her feet. Seeing Vidur coming, Kunti started mourning again and again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)