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mahabharat 1.206.45: वहाँ मदमस्त मोरों की काँव-काँव और चिर-मग्न कोयलों ​​की कूक गूँजती थी। उन उद्यानों में दर्पण के समान स्वच्छ क्रीड़ा-स्थल और नाना प्रकार के वृक्ष-मंडप बने हुए थे ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 1.206: पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 206: पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.206.45 
मत्तबर्हिणसंघुष्टकोकिलैश्च सदामदै:।
गृहैरादर्शविमलैर्विविधैश्च लतागृहै:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ मदमस्त मोरों की काँव-काँव और चिर-मग्न कोयलों ​​की कूक गूँजती थी। उन उद्यानों में दर्पण के समान स्वच्छ क्रीड़ा-स्थल और नाना प्रकार के वृक्ष-मंडप बने हुए थे ॥ 45॥
 
The cawing of the intoxicated peacocks and the cackling of the ever-mad cuckoos resonated there. In those gardens, play areas as clean as a mirror and various kinds of tree pavilions were made. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)