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mahabharat 1.206.32: उस नगरी के द्वार ऐसे लग रहे थे मानो वे पंख फैलाए हुए गरुड़ हों। ऐसे अनेक विशाल द्वार और मीनारें उस नगरी की शोभा बढ़ा रही थीं। वह नगरी चारों ओर से बादलों के समान सुशोभित और मंदार पर्वत के समान ऊँचे गोपुरों से सुरक्षित थी।   |   mahabharat अध्याय 1.206: पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 206: पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.206.32 
द्विपक्षगरुडप्रख्यैद्वार्रै: सौधैश्च शोभितम्।
गुप्तमभ्रचयप्रख्यैर्गोपुरैर्मन्दरोपमै:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
उस नगरी के द्वार ऐसे लग रहे थे मानो वे पंख फैलाए हुए गरुड़ हों। ऐसे अनेक विशाल द्वार और मीनारें उस नगरी की शोभा बढ़ा रही थीं। वह नगरी चारों ओर से बादलों के समान सुशोभित और मंदार पर्वत के समान ऊँचे गोपुरों से सुरक्षित थी।
 
The gates of that city looked as if they were Garudas with their wings spread. Many such big gates and towers were adding to the splendour of that city. That city was protected from all sides by the gopuras which were decorated like clouds and were as high as Mandara mountain.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)