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mahabharat 1.204.2-3: राजन! कौरवों में श्रेष्ठ शान्तनुपुत्र भीष्म ने तुम्हें कुछ ऐसा बताया है जो तुम्हारे लिए हितकर और हितकर है; परन्तु तुम उसे स्वीकार नहीं कर रहे हो। इसी प्रकार आचार्य द्रोण ने भी अनेक प्रकार से तुम्हें कुछ ऐसा बताया है जो तुम्हारे लिए हितकर है; परन्तु राधापुत्र कर्ण उसे तुम्हारे लिए हितकर नहीं मानता।   |   mahabharat अध्याय 1.204: विदुरजीकी सम्मति—द्रोण और भीष्मके वचनोंका ही समर्थन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 204: विदुरजीकी सम्मति—द्रोण और भीष्मके वचनोंका ही समर्थन  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  1.204.2-3 
प्रियं हितं च तद् वाक्यमुक्तवान् कुरुसत्तम:।
भीष्म: शांतनवो राजन् प्रतिगृह्णासि तन्न च॥ २॥
तथा द्रोणेन बहुधा भाषितं हितमुत्तमम्।
तच्च राधासुत: कर्णो मन्यते न हितं तव॥ ३॥
 
 
अनुवाद
राजन! कौरवों में श्रेष्ठ शान्तनुपुत्र भीष्म ने तुम्हें कुछ ऐसा बताया है जो तुम्हारे लिए हितकर और हितकर है; परन्तु तुम उसे स्वीकार नहीं कर रहे हो। इसी प्रकार आचार्य द्रोण ने भी अनेक प्रकार से तुम्हें कुछ ऐसा बताया है जो तुम्हारे लिए हितकर है; परन्तु राधापुत्र कर्ण उसे तुम्हारे लिए हितकर नहीं मानता।
 
King! The best of the Kurus, Shantanu's son Bhishma has told you something that is pleasant and beneficial to you; but you are not accepting it. Similarly, Acharya Drona has told you in many ways that it is beneficial for you; but Radha's son Karna does not consider it beneficial for you. 2-3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)