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mahabharat 1.203.6: इसी प्रकार वह कुन्ती और माद्री के पुत्रों को भी सान्त्वना दे और बार-बार इस सम्बन्ध की उपयुक्तता और प्रेम की बात कहे ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 1.203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.203.6 
उचितत्वं प्रियत्वं च योगस्यापि च वर्णयेत्।
पुन: पुनश्च कौन्तेयान् माद्रीपुत्रौ च सान्त्वयन्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार वह कुन्ती और माद्री के पुत्रों को भी सान्त्वना दे और बार-बार इस सम्बन्ध की उपयुक्तता और प्रेम की बात कहे ॥6॥
 
In the same way he should console the sons of Kunti and Madri and repeatedly talk about the appropriateness and love of this relationship. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)