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mahabharat 1.203.23-24: राजा का राज्य भाग्य से (उसके प्रयत्न से नहीं) प्राप्त हुआ था; (अतः) भाग्य के अतिरिक्त और क्या सहारा हो सकता है? महाराज! यदि राज्य तुम्हारे भाग्य में है, तो वह सबके देखते-देखते अवश्य ही तुम्हारे पास आ जाएगा और यदि राज्य तुम्हारे भाग्य में नहीं है, तो प्रयत्न करने पर भी तुम उसे प्राप्त नहीं कर सकोगे॥ 23-24॥   |   mahabharat अध्याय 1.203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  1.203.23-24 
किमन्यद् विहिता नूनं तस्य सा पुरुषेन्द्रता।
यदि ते विहितं राज्यं भविष्यति विशाम्पते॥ २३॥
मिषत: सर्वलोकस्य स्थास्यते त्वयि तद् ध्रुवम्।
अतोऽन्यथा चेद् विहितं यतमानो न लप्स्यसे॥ २४॥
 
 
अनुवाद
राजा का राज्य भाग्य से (उसके प्रयत्न से नहीं) प्राप्त हुआ था; (अतः) भाग्य के अतिरिक्त और क्या सहारा हो सकता है? महाराज! यदि राज्य तुम्हारे भाग्य में है, तो वह सबके देखते-देखते अवश्य ही तुम्हारे पास आ जाएगा और यदि राज्य तुम्हारे भाग्य में नहीं है, तो प्रयत्न करने पर भी तुम उसे प्राप्त नहीं कर सकोगे॥ 23-24॥
 
The king's kingdom was secured by fate (not by his efforts); (therefore) what other support can there be other than fate? Maharaj! If a kingdom is in your fate, then it will certainly come to you in front of everyone's eyes and if a kingdom is not in your fate, then you will not be able to get it even if you try. ॥ 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)