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mahabharat 1.203.18: उसकी कोई भी इन्द्रिय काम करने में समर्थ नहीं थी; वह (श्वास के रोग से पीड़ित था) एक स्थान पर पड़ा रहता और गहरी साँसें लेता रहता था; इसलिए उसे प्रत्येक कार्य में अपने मंत्री की देख-रेख में रहना पड़ता था॥18॥   |   mahabharat अध्याय 1.203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.203.18 
स हीन: करणै: सर्वैरुच्छ्वासपरमो नृप:।
अमात्यसंस्थ: सर्वेषु कार्येष्वेवाभवत् तदा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उसकी कोई भी इन्द्रिय काम करने में समर्थ नहीं थी; वह (श्वास के रोग से पीड़ित था) एक स्थान पर पड़ा रहता और गहरी साँसें लेता रहता था; इसलिए उसे प्रत्येक कार्य में अपने मंत्री की देख-रेख में रहना पड़ता था॥18॥
 
None of his senses were capable of functioning; he (suffered from a disease of breathing) used to lie in one place and take deep breaths; therefore he had to be under the supervision of his minister in every task.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)