Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.203.14: जो अपने अन्तःकरण के कुविचारों को छिपाकर तथा दोषपूर्ण हृदय से उपदेश देता है, वह अपने पर श्रद्धा रखने वाले महात्माओं का इच्छित कल्याण कैसे प्राप्त कर सकता है? ॥14॥ | mahabharat अध्याय 1.203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
दुष्टेन मनसा यो वै प्रच्छन्नेनान्तरात्मना।
ब्रूयान्नि:श्रेयसं नाम कथं कुर्यात् सतां मतम्॥ १४॥
अनुवाद
जो अपने अन्तःकरण के कुविचारों को छिपाकर तथा दोषपूर्ण हृदय से उपदेश देता है, वह अपने पर श्रद्धा रखने वाले महात्माओं का इच्छित कल्याण कैसे प्राप्त कर सकता है? ॥14॥
How can he, who conceals the evil intentions of his conscience and gives advice with a flawed heart, achieve the desired welfare of the saints who have faith in him? ॥14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥