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mahabharat 1.203.13: कर्ण ने कहा- महाराज! भीष्मजी और द्रोणाचार्य आपसे सदैव धन और सम्मान प्राप्त करते हैं। आप उन्हें अपना घनिष्ठ मित्र मानते हैं और सभी विषयों में उनकी सलाह लेते हैं। फिर भी यदि वे आपके हित के लिए सलाह नहीं देते, तो इससे बढ़कर आश्चर्य की बात और क्या हो सकती है?॥13॥   |   mahabharat अध्याय 1.203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.203.13 
कर्ण उवाच
योजितावर्थमानाभ्यां सर्वकार्येष्वनन्तरौ।
न मन्त्रयेतां त्वच्छ्रेय: किमद्‍भुततरं तत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
कर्ण ने कहा- महाराज! भीष्मजी और द्रोणाचार्य आपसे सदैव धन और सम्मान प्राप्त करते हैं। आप उन्हें अपना घनिष्ठ मित्र मानते हैं और सभी विषयों में उनकी सलाह लेते हैं। फिर भी यदि वे आपके हित के लिए सलाह नहीं देते, तो इससे बढ़कर आश्चर्य की बात और क्या हो सकती है?॥13॥
 
Karna said— Maharaj! Bhishmaji and Dronacharya always receive money and respect from you. You consider them your close friends and take their advice in all matters. Yet if they do not give advice for your good, then what can be more surprising than this?॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)