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mahabharat 1.203.1: द्रोणाचार्य बोले, "राजा धृतराष्ट्र! हम परम्परा से सुनते आये हैं कि परामर्श के लिए बुलाए गए शुभचिंतकों को ऐसी बातें कहना उचित होता है, जिनसे धर्म, अर्थ और यश की प्राप्ति हो।" ॥1॥   |   mahabharat अध्याय 1.203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 203: द्रोणाचार्यकी पाण्डवोंको उपहार भेजने और बुलानेकी सम्मति तथा कर्णके द्वारा उनकी सम्मतिका विरोध करनेपर द्रोणाचार्यकी फटकार  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  1.203.1 
द्रोण उवाच
मन्त्राय समुपानीतैर्धृतराष्ट्र हितैर्नृप।
धर्म्यमर्थ्यं यशस्यं च वाच्यमित्यनुशुश्रुम॥ १॥
 
 
अनुवाद
द्रोणाचार्य बोले, "राजा धृतराष्ट्र! हम परम्परा से सुनते आये हैं कि परामर्श के लिए बुलाए गए शुभचिंतकों को ऐसी बातें कहना उचित होता है, जिनसे धर्म, अर्थ और यश की प्राप्ति हो।" ॥1॥
 
Dronacharya said, "King Dhritarashtra! We have been hearing from tradition that it is appropriate for the well-wishers called for advice to say such things that will help one attain Dharma, Artha and Fame." ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)