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mahabharat 1.20.5: उग्रश्रवाजी कहते हैं - इस प्रकार दोनों बहनें एक-दूसरे से यह शर्त रखकर कि वे एक-दूसरे की दासी बनेंगी, अपने-अपने घर चली गईं और उन्होंने निश्चय किया कि वे अगले दिन आकर घोड़े को देखेंगी।   |   mahabharat अध्याय 1.20: कद्रू और विनताकी होड़, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप एवं ब्रह्माजीद्वारा उसका अनुमोदन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 20: कद्रू और विनताकी होड़, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप एवं ब्रह्माजीद्वारा उसका अनुमोदन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.20.5 
सौतिरुवाच
एवं ते समयं कृत्वा दासीभावाय वै मिथ:।
जग्मतु: स्वगृहानेव श्वो द्रक्ष्याव इति स्म ह॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - इस प्रकार दोनों बहनें एक-दूसरे से यह शर्त रखकर कि वे एक-दूसरे की दासी बनेंगी, अपने-अपने घर चली गईं और उन्होंने निश्चय किया कि वे अगले दिन आकर घोड़े को देखेंगी।
 
Ugrasravaji says - In this way both the sisters went to their respective homes after making a condition to each other that they would be each other's maidservant and they decided that they would come the next day and see the horse. 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)