तेजोंऽशानां च सम्पातो भीष्मस्याप्यत्र सम्भव:।
राज्यान्निवर्तनं तस्य ब्रह्मचर्यव्रते स्थिति:॥ ९८॥
प्रतिज्ञापालनं चैव रक्षा चित्राङ्गदस्य च।
हते चित्राङ्गदे चैव रक्षा भ्रातुर्यवीयस:॥ ९९॥
विचित्रवीर्यस्य तथा राज्ये सम्प्रतिपादनम्।
धर्मस्य नृषु सम्भूतिरणीमाण्डव्यशापजा॥ १००॥
कृष्णद्वैपायनाच्चैव प्रसूतिर्वरदानजा।
धृतराष्ट्रस्य पाण्डोश्च पाण्डवानां च सम्भव:॥ १०१॥
अनुवाद
इस पर्व में वसुओं के तेज के अंश भीष्म के जन्म की कथा भी है। उनका राज्य से संन्यास लेना, आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत में रहने की प्रतिज्ञा, अपनी प्रतिज्ञा का पालन, चित्रांगद की रक्षा तथा चित्रांगद की मृत्यु के पश्चात् उनके छोटे भाई विचित्रवीर्य की रक्षा, उन्हें राज्य का समर्पण, अणिमाण्डव्य के शाप से विदुर के रूप में मनुष्यों में भगवान धर्म का जन्म, श्री कृष्णद्वैपायन के वरदान से धृतराष्ट्र और पाण्डुक का जन्म तथा पाण्डवों की उत्पत्ति की कथा भी इसी प्रसंग में है। 98—101॥
In this festival, there is also the story of the birth of Bhishma, who is a part of the glory of the Vasus. His retirement from the kingdom, his vow to remain in the vow of celibacy throughout his life, keeping his vow, protection of Chitrangada and protection of his younger brother Vichitravirya after Chitrangada's death, dedication of the kingdom to him, birth of Lord Dharma among humans in the form of Vidur due to the curse of Animandavya, birth of Dhritarashtra and Panduka due to the boon of Shri Krishnadvaipayana and the origin story of Pandavas is also there in this context. 98—101॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥