श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 94-96
 
 
श्लोक  1.2.94-96 
दैत्यानां दानवानां च यक्षाणां च महौजसाम्।
नागानामथ सर्पाणां गन्धर्वाणां पतत्त्रिणाम्॥ ९४॥
अन्येषां चैव भूतानां विविधानां समुद्भव:।
महर्षेराश्रमपदे कण्वस्य च तपस्विन:॥ ९५॥
शकुन्तलायां दुष्यन्ताद् भरतश्चापि जज्ञिवान्।
यस्य लोकेषु नाम्नेदं प्रथितं भारतं कुलम्॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
इस पर्व में दैत्यों, दानवों, यक्षों, नागों, गन्धर्वों, पक्षियों तथा नाना प्रकार के प्राणियों की उत्पत्ति का अत्यन्त प्रभावशाली वर्णन है। परम तपस्वी महर्षि कण्व के आश्रम में दुष्यंत द्वारा शकुन्तला के गर्भ से भरत के जन्म की कथा भी यहाँ कही गई है। यह भरतवंश उस महात्मा भरत के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ है। 94-96॥
 
In this festival, there is a very impressive description of the origin of demons, demons, yakshas, snakes, Gandharvas and birds and various other types of creatures. The story of Bharat's birth from Shakuntala's womb by Dushyant in the ashram of the supreme ascetic Maharishi Kanva is also told here. This Bharatvansh has become famous in the world by the name of that Mahatma Bharat. 94-96॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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