श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  1.2.84 
यथावत् सूतपुत्रेण लौमहर्षणिना तत:।
उक्तानि नैमिषारण्ये पर्वाण्यष्टादशैव तु॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
व्यास की रचना पूर्ण होने पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवाजी ने इन सौ पर्वों को अठारह पर्वों में व्यवस्थित किया और नैमिषारण्यक्षेत्र में ऋषियों को सुनाया।
 
After the completion of Vyasa's compositions, Ugrashravaji, son of Lomaharshana, organised these hundred festivals into eighteen festivals and narrated them to the sages at Naimisharanyakshetra. 84.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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