श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  1.2.8-9 
राम उवाच
यदि मे पितर: प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि।
यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया॥ ८॥
अतश्च पापान्मुच्येऽहमेष मे प्रार्थितो वर:।
ह्रदाश्च तीर्थभूता मे भवेयुर्भुवि विश्रुता:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
परशुराम ने कहा, "यदि आप सभी पूर्वज मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे अपनी कृपा का पात्र समझें, तो मैं क्रोधवश क्षत्रिय कुल का नाश करने के पाप से मुक्त हो जाऊँ तथा मेरे द्वारा निर्मित सरोवर पृथ्वी पर प्रसिद्ध तीर्थ बन जाएँ। यही वर मैं आप सभी से चाहता हूँ।"
 
Parshuram said, "If all of you, our ancestors, are pleased with me and consider me worthy of your grace, then I should be freed from the sin of destroying the Kshatriya clan out of anger and the lakes built by me should become famous pilgrimage places on earth. This is the boon I want from you all. 8-9.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas