श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 396
 
 
श्लोक  1.2.396 
आख्यानं तदिदमनुत्तमं महार्थं
विज्ञेयं महदिह पर्वसंग्रहेण।
श्रुत्वादौ भवति नृणां सुखावगाहं-
विस्तीर्णं लवणजलं यथा प्लवेन॥ ३९६॥
 
 
अनुवाद
इस महान् एवं अर्थपूर्ण महाभारत कथा को यहाँ पर्वसंग्रहाध्याय के द्वारा समझना चाहिए। इस अध्याय को पहले सुनने से मनुष्यों के लिए महाभारतरूपी महासमुद्र में प्रवेश करना वैसे ही सरल हो जाता है जैसे जहाज की सहायता से विशाल समुद्र में प्रवेश करना सरल हो जाता है॥396॥
 
This great and meaningful Mahabharat story should be understood here through the Parvasangrahaadhyaya. After listening to this chapter first, it becomes easy for humans to enter the great ocean like Mahabharat just as it becomes easy to enter the vast ocean with the help of a ship.॥ 396॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पर्वसंग्रहपर्वणि द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत पर्वसंग्रहपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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