श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 395
 
 
श्लोक  1.2.395 
यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति
विप्राय वेदविदुषे च बहुश्रुताय।
पुण्यां च भारतकथां शृणुयाच्च नित्यं
तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव॥ ३९५॥
 
 
अनुवाद
जो गौओं के सींगों पर सोना मढ़कर प्रतिदिन सौ गौएँ वेदान्ती और विद्वान ब्राह्मण को दान करता है तथा जो केवल महाभारत की कथा सुनता है, उन दोनों को समान फल प्राप्त होता है ॥395॥
 
The one who, by plating gold on the horns of cows, donates a hundred cows every day to a Vedantist and a learned Brahmin, and the one who only listens to the story of Mahabharata, each of them gets equal results. 395॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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