श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 394
 
 
श्लोक  1.2.394 
यद् रात्रौ कुरुते पापं कर्मणा मनसा गिरा।
महाभारतमाख्याय पूर्वां संध्यां प्रमुच्यते॥ ३९४॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार रात्रि में मन, वाणी और कर्म से जो भी पाप होते हैं, प्रातःकाल महाभारत का पाठ करने से उनसे मुक्ति मिल जाती है ॥394॥
 
Similarly, whatever sins one commits through thoughts, speech and actions at night, one gets absolved from them by reciting the Mahabharata in the morning. ॥ 394॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)