श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 392
 
 
श्लोक  1.2.392 
द्वैपायनोष्ठपुटनि:सृतमप्रमेयं
पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च।
यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं
किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन॥ ३९२॥
 
 
अनुवाद
जो व्यासजी के मुख से निकले हुए इस अतुलनीय पुण्यमय, पवित्र, पापनाशक और कल्याणकारी महाभारत को दूसरों के मुख से सुनता है, उसे पुष्कर तीर्थ के जल में डुबकी लगाने की क्या आवश्यकता है ? 392॥
 
One who listens to this incomparable virtuous, holy, sinful and beneficial Mahabharata coming from the mouth of Vyasji from the mouth of others, what is the need for him to take a dip in the waters of Pushkar Tirtha? 392॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)