श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 391
 
 
श्लोक  1.2.391 
धर्मे मतिर्भवतु व: सततोत्थितानां
स ह्येक एव परलोकगतस्य बन्धु:।
अर्था: स्त्रियश्च निपुणैरपि सेव्यमाना
नैवाप्तभावमुपयान्ति न च स्थिरत्वम्॥ ३९१॥
 
 
अनुवाद
हे तपस्वी ऋषियों (और महाभारत के पाठकों!) आप सभी लोग सांसारिक आसक्तियों से सदैव ऊपर उठें और आपका मन सदैव धर्म में लगा रहे, क्योंकि परलोक गए हुए जीव का एकमात्र मित्र या सहायक धर्म ही है। चतुर पुरुष भी धन और स्त्री का भोग करते हैं, परन्तु उनकी श्रेष्ठता को नहीं मानते और उन्हें स्थायी नहीं मानते ॥391॥
 
O ascetic sages (and readers of the Mahabharata!) May you all always rise above worldly attachments and may your mind always be devoted to Dharma, because Dharma is the only friend or helper of a soul who has gone to the next world. Even clever men enjoy wealth and women, but they do not believe in their superiority and do not consider them permanent. ॥ 391॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)