श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 384
 
 
श्लोक  1.2.384 
श्रुत्वा त्विदमुपाख्यानं श्राव्यमन्यन्न रोचते।
पुंस्कोकिलरुतं श्रुत्वा रूक्षा ध्वाङ्क्षस्य वागिव॥ ३८४॥
 
 
अनुवाद
इस उपाख्यान को सुनने के बाद अन्य कोई बात सुनने में अच्छी नहीं लगती। कोयल की कूक सुनकर कौओं की कर्कश काँव-काँव किसे अच्छी लगेगी?॥384॥
 
After listening to this anecdote, one does not like to listen to anything else. Who would like the harsh cawing of crows after listening to the chirping of the cuckoo?॥ 384॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)