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mahabharat 1.2.38: जैसे आत्मोन्नति चाहने वाले महत्त्वाकांक्षी सेवक अपने श्रेष्ठ एवं हितैषी स्वामियों की सेवा करते हैं, वैसे ही संसार के महान कवि इस महाभारत की सेवा करके अपनी कविताएँ रचते हैं॥ 38॥   |   mahabharat अध्याय 1.2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  1.2.38 
तदेतद् भारतं नाम कविभिस्तूपजीव्यते।
उदयप्रेप्सुभिर्भृत्यैरभिजात इवेश्वर:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
जैसे आत्मोन्नति चाहने वाले महत्त्वाकांक्षी सेवक अपने श्रेष्ठ एवं हितैषी स्वामियों की सेवा करते हैं, वैसे ही संसार के महान कवि इस महाभारत की सेवा करके अपनी कविताएँ रचते हैं॥ 38॥
 
Just as ambitious servants seeking self-promotion serve their noble and benevolent masters, similarly the world's greatest poets compose their poems by serving this Mahabharata.॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)