श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 358
 
 
श्लोक  1.2.358 
स संस्कृत्य नरश्रेष्ठं मातुलं शौरिमात्मन:।
ददर्श यदुवीराणामापाने वैशसं महत्॥ ३५८॥
 
 
अनुवाद
अपने मामा वसुदेवजी का दाह-संस्कार करके वे उनकी शरण में गए और यदुवंशी वीरों के भयंकर विनाश का रोमांचकारी दृश्य देखा ॥358॥
 
After cremating his maternal uncle Vasudevji, he went to his refuge and saw the thrilling scene of the terrible destruction of the Yaduvanshi heroes. 358॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)