श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 357
 
 
श्लोक  1.2.357 
यत्रार्जुनो द्वारवतीमेत्य वृष्णिविनाकृताम्।
दृष्ट्वा विषादमगमत् परां चार्तिं नरर्षभ:॥ ३५७॥
 
 
अनुवाद
ऐसा भी प्रसंग है कि पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन द्वारका में आये और उसे वृष्णियों से वीरान देखकर शोक में डूब गये। उस समय उनके हृदय में बड़ी पीड़ा हुई ॥357॥
 
There is also the incident that the best of men Arjun came to Dwarka and on seeing it deserted of the Vrishnis, he was drowned in sorrow. At that time, he felt great pain in his heart. ॥ 357॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)