श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.2.35 
विचित्रार्थपदाख्यानमनेकसमयान्वितम् ।
प्रतिपन्नं नरै: प्राज्ञैर्वैराग्यमिव मोक्षिभि:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जैसे मोक्ष चाहने वाला मनुष्य अन्य लोकों का त्याग करके शरण लेता है, वैसे ही बुद्धिमान पुरुष इस महाभारत का आश्रय लेते हैं, जो अलौकिक अर्थ, विचित्र वचन, अद्भुत आख्यान और नाना प्रकार के अनूठे विधि-विधानों से युक्त है।
 
Just as a man seeking salvation takes refuge in renunciation of other worlds, similarly wise men take refuge in this Mahabharata, which is endowed with supernatural meaning, strange words, marvelous narration and various unique rules and regulations.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas