श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 333
 
 
श्लोक  1.2.333 
व्यवहारोऽत्र कात्‍स्‍न्‍‍‍र्येन धर्मार्थी य: प्रकीर्तित:।
विविधानां च दानानां फलयोगा: प्रकीर्तिता:॥ ३३३॥
 
 
अनुवाद
इसमें धर्म और अर्थ संबंधी कल्याणकारी आचरण का वर्णन किया गया है। साथ ही विविध प्रकार के दानों के लाभ का भी वर्णन किया गया है ॥333॥
 
In this, beneficial conduct related to Dharma and Artha has been described. Along with this, the benefits of various types of donations have also been described. ॥ 333॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)