श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 2: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  1.2.33-34 
यत्तु शौनक सत्रे ते भारताख्यानमुत्तमम्।
जनमेजयस्य तत् सत्रे व्यासशिष्येण धीमता॥ ३३॥
कथितं विस्तरार्थं च यशो वीर्यं महीक्षिताम्।
पौष्यं तत्र च पौलोममास्तीकं चादित: स्मृतम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
शौनकजी! महाभारत का जो महान इतिहास मैं इस सत्संग में आपको सुना रहा हूँ, वही व्यासजी के बुद्धिमान शिष्य वैशम्पायनजी ने जनमेजय के सर्पयज्ञ में सुनाया था। महान राजाओं के यश और पराक्रम का विस्तार से वर्णन करने के लिए उन्होंने प्रारम्भ में पौष, पौलोम और आस्तिक - इन तीन पर्वों का उल्लेख किया है। 33-34.
 
Shaunakji! The great history of Mahabharata which I am narrating to you in this Satsang session was also narrated by Vyasa's wise disciple Vaishampayanaji in the snake sacrifice of Janamejaya. In order to describe in detail the fame and valour of the great kings, he has mentioned the three festivals - Paushya, Pauloma and Astik - in the beginning. 33-34.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)